फ़ौजी
वतन कि खातिर जीता हैं,
वतन कि खातिर ही मर जाता हैं,
हां वही फ़ौजी कहलाता हैं(1)
जो भारत को अपनी मां बताता हैं,
जिसकी वज़ह से ही हर भारतीय चैन की नींद सो पाता हैं,
हां वही फ़ौजी कहलाता हैं(2)
चाहे जान चली जाए खुद की,
उसकी मौजूदगी में, गद्दार कोई भी तिरंगे को छू नही पाता है
हां वही फ़ौजी कहलाता हैं (3)
मौत भी जिसे छूने से कतराती हैं
सर पर कफ़न बांधे, दुश्मनों को जो धूल चटाता हैं,
हां वही फ़ौजी कहलाता हैं(4)
सरहदों की रखवारी के खातिर,
जो रातों को सोना तक भूल जाता है
हां वही फ़ौजी कहलाता हैं(5)