पुस्तकालय
जब पहली दफा मेने पुस्तकालय देखा
जहां किताबो का शोर इतना ज्यादा था,
की कुछ भी सुनाई नही दे पा रहा था,
इंसान किताबो से खूब गुफ्तगू कर रहे थे,
लेकिन वातावरण फिर भी कितना मौन था,
ना जाने उस शांति का कारण कौन था?
शायद उस शांति का कारण वो लेडी डॉन थी,
जो सबसे अलग बैठी किताबों के सिर्फ पहले पन्ने को खोल कर कुछ अपनी कापी में लिखती थी,
नाक पर ऐनक, बड़ी बड़ी आंखे, चेहरा लाल, बहुत गुस्से वाली दिखती थी,
दवे पाव डरता हुआ मैं उनके पास पहुंचा था
मैने धीमे स्वर में उनसे पूछा था
राजनीति की किताबे कहा हैं?
उन्होंने बड़े प्यार से इशारा करते हुए कहा, बेटा वहा हैं,
वो भले ही दिखने में खतरनाक थी,
मगर जुवान पर मां सरस्वती विराजमान थी,
सर्वप्रथम तो मैं चौक गया, फिर सोचा वो भी तो दुर्गा का अवतार थी,
वो भी तो किसी की बेटी, किसी की पत्नी, किसी की मां थी,
तभी तो उनमें इतनी सरलता थी,
बिना जाने लोगो को समझने में, मैं गलत साबित हुआ,
वैसे कौनसा मेरे साथ यह पहली मर्तवा हुआ?
एक किताब ली, और वही पढ़ने बैठ गया
ना जाने उस जगह घड़ी की रफ़्तार तेज थी
या फिर जिस पर मैं बैठा था वो बहुत आरामदायक मेज थी
जिससे बीते ५ घंटो का पता ना चला
घड़ी की ओर देखने के बाद मैं अपने घर की ओर चला
घड़ी की ओर देखने के बाद मैं अपने घर की ओर चला!!!!