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हम शिव के दीवाने हैं

हम भिक्षुक भी, हम संहारक भी, हम करुणा भी, हम हुँकार भी। हम शिव के वो दीवाने हैं, जो संकट से करें ललकार भी। हम भस्म रमाएँ माथे पर, पर आँखों में अंगार लिए। हम रुद्र-वंश के साधक हैं, सीने में ज्वाला अपार लिए। हम झुकते हैं शिव चरणों में, बाकी हर अभिमान झुकाते हैं। जो धर्म पे दृष्टि उठाता है, हम उसको सत्य दिखाते हैं। हम गंगा जैसे निर्मल भी, हम प्रलय का प्रचंड प्रवाह भी। हम भोले की मुस्कान भी, हम रौद्र तांडव की चाह भी। हम डमरू की वह गूँज हैं, जिससे सोया साहस जागे। हम त्रिशूल की वह धार हैं, जिससे अधर्म का मस्तक भागे। हम कैलाशों की शीतलता, हम रणभूमि की ज्वाला हैं। हम शिव के ऐसे भक्त नहीं, हम शिव के जीते-जागते भाला हैं। हम नंदी का अटूट धैर्य, हम वीरभद्र का क्रोध भी हैं। हम मौन तपस्या की सीमा, हम युद्धों का उद्घोष भी हैं। जो राख समझकर ठुकराए, वही राख ज्वालामुखी होगी। जो रुद्र-भक्त को ललकारे, उसकी हर साँस अधूरी होगी। हम शब्द नहीं, हुंकार हैं, हम साँस नहीं, तलवार हैं। हम शिव की तीसरी आँख का, धरती पर चलता अवतार हैं। हर बूंद सावन की कहती है— अब रुद्रत्व को स्वीकार करो। महादेव के वीर सपूतो, अन्याय पर प्रहार करो। जब तक नभ में बादल होंगे, जब तक गंगा की धार रहे, जब तक कैलाश अडिग खड़ा, तब तक "हर-हर महादेव" की ललकार रहे!
— Anuj Singh
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